कहां हो रही चूक?
सर्दियां आते ही शुरू हो गया शादियों का सिलसिला।शादी जिसे हमारे देश में सबसे ऊंचा और पवित्र रिश्ता माना जाता है। कहते हैं कि इस बंधन में बंधने वाले लोग सात जन्मों तक एक दूजे के हो जाते हैं। पिछले साल तक मैं भी यही मानती थी कि इस रिश्ते में जुड़ने वाले लोग एक दूसरे के लिए समर्पित रहते हैं। सोचूं भी क्यों न क्योंकि बचपन से मां और पापा हर परिस्थिति में एक दूसरे का लिए साथ निभाते जो देखा है। मां-पापा के बीच का प्यार और उनकी एक दूसरे के प्रति समझ को देख कर कभी सोचा ही नहीं कि यह रिश्ता भी कभी सवालों के घेरे में आ सकता है। पर अब ऐसे कुछ किस्से सुनने में आए हैं जिसके बाद यह सोचना पर मन मजबूर हो उठता है कि क्या वाकई शादी का रिश्ता अटूट होता है? एक किस्से से शुरू करते हैं रिश्तों के डर की कहानी :
पिछले साल की बात है, ठीक से तारीख तो नहीं याद पर इतना याद है कि सर्दियों के दिन थे। एक रिश्तेदार की बेटी की शादी थी। मिश्रा जी की बड़ी बेटी नीतू की शादी थी, क्योंकि घर की पहली शादी थी इसलिए इंतजाम भी टॉप क्लास था। बारातियों और रिश्तेदारों के खानपान और रहने तक के इंतजाम में मिश्रा परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। धूम - धाम से बेटी की शादी सम्पन्न हो गई, दुल्हन बन कर उनकी बेटी विदेश चली गई।
मिश्रा जी की बेटी विदेश के किसी बैंक में काम करती थी। उसकी सहूलियत के लिए मिश्रा जी ने रिश्ता भी वहीं का ढूंढा था। अभी हाल ही में नीतू के मायके लौटने की बात सुनी। वैसे तो शादी के बाद वह कई बार मायके आई थी, पर इस बार वजह और थी। इस बार वह अपना ससुराल छोड़कर आई थी।
पिछले काफी समय से न जाने कितने ऐसे किस्से सुनने को मिले, जिनमें शादी की पहली सालगिरह आने से पहले ही नौबत तलाक तक आ पहुंची। और सिर्फ तलाक ही नहीं लड़कियां तो महिला आयोग और महिलाओं के अधिकार दिलाने वाली संस्थाओं तक का दरवाजा पीट डालती है। पर यह दस्तक रिश्ता बचाने के लिए कम बल्कि ससूरालवालों की बदनामी के लिए ज्यादा दी जाती है। आखिर क्या है वजह कि जो लड़की कुछ दिन पहले एक परिवार को अपनाने के लिए आई थी, वही आज उस परिवार की बदनामी का कारण बन गई।
इस समाज में जहां स्त्री और पुरुष को बराबर मानने की बात की जाती है, वहां सिर्फ स्त्रियों के लिए ही सारे आयोग क्यों। सिर्फ उनके ही हित में सारे कानून क्यों? क्यों सिर्फ महिलाओं को ही बेचारगी की नजरों से देखा जाता है। क्या पुरुष में भावनाएं नहीं होती, क्या उन्हें खुद का पक्ष रखने का अधिकार नहीं होता? लोग कहते हैं कि एक रिश्ते को तोड़ना एक स्त्री के लिए आसान नहीं होता। पर मेरा मानना है कि यह बात पुरुषों के लिए भी आसान नहीं होती। ये न्याय और कानून के रचियता ये क्यों नहीं समझते कि एक स्त्री रो कर अपना दुख निकाल सकती है। पर पुरुषों को तो समाज ने ही एक मजबूत मूर्ति के तौर पे पेश किया है। वह तो खुल कर रो भी नहीं सकता। इन अंधे न्यायाधीशों को सोचना चाहिए कि ऐसी कठिन परिस्थिति में एक असहाय मनुष्य किस मानसिक तनाव से गुजर रहा होगा। इसका उदाहरण पिछले एक साल में पारिवारिक कलह से परेशान हो कर जान देने वाले पुलिस अधिकारी बखूबी दे पाएंगे।
पिछले समय में मैंने जितने भी रिश्ते टूटते देखे हैं, उनमें बस एक ही बात सामने आई है और वह है स्त्रियों में एकल परिवार की कामना। अब सवाल यह है कि आखिर क्यों आज कल की लड़कियों को भरा पूरा परिवार नहीं चाहिए?
जिनके घरों में ऐसे मामले हुए हैं या हो रहे हैं उनसे बात करके बस एक बात समझ आई और वह है लड़कियों में अपने लिए जीने की चाहत। आज कल के इस मॉडर्न जमाने में अधिकतर लड़कियां शादी से पहले एक अच्छी नौकरी पाने की ख्वाहिश रखतीं हैं। वैसे इस बात का मैं भी समर्थन करती हूं कि एक उम्र के बाद हमें खुद हमें अपने खर्चे उठाने शुरू कर देने चाहिए। खैर... लोगों कि बातों से निष्कर्ष निकाला कि जॉब की यह चाहत खुद के लिए जीने की इच्छा ही शादी जैसे पवित्र रिश्ते का गला घोंटती जा रही है। शादी के पहले एक लड़की पर शायद उतनी जिम्मेदारियां नहीं होती, जितनी की शादी के बाद। शादी के बाद एक लड़की तमाम नए रिश्तों से जुड़ती है। हर रिश्ते की अपनी अलग अपेक्षा होती है। पर घर के कामकाज और नौकरी के बीच तालमेल बिठाने की जंग में हर दिन एक नया रिश्ता सूली चढ़ता जा रहा है।
टूटते रिश्तों की बढ़ती संख्या अक्सर मेरे जहन में एक प्रश्न खड़ा करती है। कि क्या आज कल की लड़कियों के लिए नौकरी करना एक रिश्ता बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
माहौल को देखते हुए पूरानी सोच रखने वाले माता-पिता भी बच्चों की खुशी के लिए कोई सख्ती नहीं करते। ससुराल में लड़कियों को उनके मन मुताबिक रखा जाता है। ससुरालवालों की बस एक ही अपेक्षा होती है कि घर का नया सदस्य सभी को सम्मान दे। इतनी सहुलीयत मिलने के बाद भी न जाने क्यों रिश्ते बस नाम के लिए बनते जा रहे हैं। उनमें कोई सम्वेदनशीलता नहीं रह जा रही है।
मैं ये नहीं कहती कि लड़कियां शादी के बाद जॉब छोड़ कर नौकरानियों जैसा जीवन बिताएं। पर अगर आप किसी नए व्यक्ति या परिवार से जुड़े हो, तो आप को अपने मन में उस परिवार के प्रति अपनों जैसा प्यार दिखाना आना चाहिए। और जो लड़कियां ये सोचतीं हैं कि सिर्फ हम ही क्यों परिवार का ख्याल रखें? उनके लिए बस एक ही बात कहना चाहूंगी कि अपनों को चाहना में किस बात का कॉम्पिटिशन। इस कॉम्पिटिशन के दौर में न जाने कितने लोग रिश्तों के एग्जाम में फेल होते जा रहे हैं।
अगर देश के मॉडर्न समाज ने अपनी मानसिकता नहीं बदली तो वह दिन दूर नहीं जब कोर्ट कचहरी के डर से लोग शादी करना ही छोड़ देंगे। और हो सकता है देश में एक पवित्र रिश्ता बस चर्चा का विषय बन कर रह जाए। ( यह मेरे अपने विचार हैं। अधिक आत्मनिर्भरता को रिश्तों से ज्यादा तवज्जो देने वाली लड़कियां दिल पे न लें) धन्यवाद!!
पिछले साल की बात है, ठीक से तारीख तो नहीं याद पर इतना याद है कि सर्दियों के दिन थे। एक रिश्तेदार की बेटी की शादी थी। मिश्रा जी की बड़ी बेटी नीतू की शादी थी, क्योंकि घर की पहली शादी थी इसलिए इंतजाम भी टॉप क्लास था। बारातियों और रिश्तेदारों के खानपान और रहने तक के इंतजाम में मिश्रा परिवार ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। धूम - धाम से बेटी की शादी सम्पन्न हो गई, दुल्हन बन कर उनकी बेटी विदेश चली गई।
मिश्रा जी की बेटी विदेश के किसी बैंक में काम करती थी। उसकी सहूलियत के लिए मिश्रा जी ने रिश्ता भी वहीं का ढूंढा था। अभी हाल ही में नीतू के मायके लौटने की बात सुनी। वैसे तो शादी के बाद वह कई बार मायके आई थी, पर इस बार वजह और थी। इस बार वह अपना ससुराल छोड़कर आई थी।
पिछले काफी समय से न जाने कितने ऐसे किस्से सुनने को मिले, जिनमें शादी की पहली सालगिरह आने से पहले ही नौबत तलाक तक आ पहुंची। और सिर्फ तलाक ही नहीं लड़कियां तो महिला आयोग और महिलाओं के अधिकार दिलाने वाली संस्थाओं तक का दरवाजा पीट डालती है। पर यह दस्तक रिश्ता बचाने के लिए कम बल्कि ससूरालवालों की बदनामी के लिए ज्यादा दी जाती है। आखिर क्या है वजह कि जो लड़की कुछ दिन पहले एक परिवार को अपनाने के लिए आई थी, वही आज उस परिवार की बदनामी का कारण बन गई।
इस समाज में जहां स्त्री और पुरुष को बराबर मानने की बात की जाती है, वहां सिर्फ स्त्रियों के लिए ही सारे आयोग क्यों। सिर्फ उनके ही हित में सारे कानून क्यों? क्यों सिर्फ महिलाओं को ही बेचारगी की नजरों से देखा जाता है। क्या पुरुष में भावनाएं नहीं होती, क्या उन्हें खुद का पक्ष रखने का अधिकार नहीं होता? लोग कहते हैं कि एक रिश्ते को तोड़ना एक स्त्री के लिए आसान नहीं होता। पर मेरा मानना है कि यह बात पुरुषों के लिए भी आसान नहीं होती। ये न्याय और कानून के रचियता ये क्यों नहीं समझते कि एक स्त्री रो कर अपना दुख निकाल सकती है। पर पुरुषों को तो समाज ने ही एक मजबूत मूर्ति के तौर पे पेश किया है। वह तो खुल कर रो भी नहीं सकता। इन अंधे न्यायाधीशों को सोचना चाहिए कि ऐसी कठिन परिस्थिति में एक असहाय मनुष्य किस मानसिक तनाव से गुजर रहा होगा। इसका उदाहरण पिछले एक साल में पारिवारिक कलह से परेशान हो कर जान देने वाले पुलिस अधिकारी बखूबी दे पाएंगे।
पिछले समय में मैंने जितने भी रिश्ते टूटते देखे हैं, उनमें बस एक ही बात सामने आई है और वह है स्त्रियों में एकल परिवार की कामना। अब सवाल यह है कि आखिर क्यों आज कल की लड़कियों को भरा पूरा परिवार नहीं चाहिए?
जिनके घरों में ऐसे मामले हुए हैं या हो रहे हैं उनसे बात करके बस एक बात समझ आई और वह है लड़कियों में अपने लिए जीने की चाहत। आज कल के इस मॉडर्न जमाने में अधिकतर लड़कियां शादी से पहले एक अच्छी नौकरी पाने की ख्वाहिश रखतीं हैं। वैसे इस बात का मैं भी समर्थन करती हूं कि एक उम्र के बाद हमें खुद हमें अपने खर्चे उठाने शुरू कर देने चाहिए। खैर... लोगों कि बातों से निष्कर्ष निकाला कि जॉब की यह चाहत खुद के लिए जीने की इच्छा ही शादी जैसे पवित्र रिश्ते का गला घोंटती जा रही है। शादी के पहले एक लड़की पर शायद उतनी जिम्मेदारियां नहीं होती, जितनी की शादी के बाद। शादी के बाद एक लड़की तमाम नए रिश्तों से जुड़ती है। हर रिश्ते की अपनी अलग अपेक्षा होती है। पर घर के कामकाज और नौकरी के बीच तालमेल बिठाने की जंग में हर दिन एक नया रिश्ता सूली चढ़ता जा रहा है।
टूटते रिश्तों की बढ़ती संख्या अक्सर मेरे जहन में एक प्रश्न खड़ा करती है। कि क्या आज कल की लड़कियों के लिए नौकरी करना एक रिश्ता बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
माहौल को देखते हुए पूरानी सोच रखने वाले माता-पिता भी बच्चों की खुशी के लिए कोई सख्ती नहीं करते। ससुराल में लड़कियों को उनके मन मुताबिक रखा जाता है। ससुरालवालों की बस एक ही अपेक्षा होती है कि घर का नया सदस्य सभी को सम्मान दे। इतनी सहुलीयत मिलने के बाद भी न जाने क्यों रिश्ते बस नाम के लिए बनते जा रहे हैं। उनमें कोई सम्वेदनशीलता नहीं रह जा रही है।
मैं ये नहीं कहती कि लड़कियां शादी के बाद जॉब छोड़ कर नौकरानियों जैसा जीवन बिताएं। पर अगर आप किसी नए व्यक्ति या परिवार से जुड़े हो, तो आप को अपने मन में उस परिवार के प्रति अपनों जैसा प्यार दिखाना आना चाहिए। और जो लड़कियां ये सोचतीं हैं कि सिर्फ हम ही क्यों परिवार का ख्याल रखें? उनके लिए बस एक ही बात कहना चाहूंगी कि अपनों को चाहना में किस बात का कॉम्पिटिशन। इस कॉम्पिटिशन के दौर में न जाने कितने लोग रिश्तों के एग्जाम में फेल होते जा रहे हैं।
अगर देश के मॉडर्न समाज ने अपनी मानसिकता नहीं बदली तो वह दिन दूर नहीं जब कोर्ट कचहरी के डर से लोग शादी करना ही छोड़ देंगे। और हो सकता है देश में एक पवित्र रिश्ता बस चर्चा का विषय बन कर रह जाए। ( यह मेरे अपने विचार हैं। अधिक आत्मनिर्भरता को रिश्तों से ज्यादा तवज्जो देने वाली लड़कियां दिल पे न लें) धन्यवाद!!
Very nicely outpoured the reality. Actually, a new type of culture is developing as females wanna imitate males but in that respect they losing the ethnicity of being a girl. However, I am not against the girls as they can't match boys but I that competition they should throw away the qualities a girl inherits. As far as I know, girls are better than boys in management, patience, affection and love hence they should go beyond the boys but without losing their girliness. Thanks for sharing such beautiful thoughts
ReplyDeleteVery nicely outpoured the reality. Actually, a new type of culture is developing as females wanna imitate males but in that respect they losing the ethnicity of being a girl. However, I am not against the girls as they can't match boys but I that competition they should throw away the qualities a girl inherits. As far as I know, girls are better than boys in management, patience, affection and love hence they should go beyond the boys but without losing their girliness. Thanks for sharing such beautiful thoughts
ReplyDeleteVery nicely outpoured the reality. Actually, a new type of culture is developing as females wanna imitate males but in that respect they losing the ethnicity of being a girl. However, I am not against the girls as they can't match boys but in that competition, they should not throw away the qualities a girl inherits. As far as I know, girls are better than boys in management, patience, affection and love hence they should go beyond the boys but without losing their girliness. Thanks for sharing such beautiful thoughts
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteअद्भुत
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