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बावरा मन

आज मन बड़ा उदास है, न जाने इसे किस बात की आस है।  न रोता है न ही चैन से सोता है, खुदा जाने ये क्या-क्या खुद में ही संजोता है।  शायद आज मन में उभरा कोई अनकहा इतिहास है या इसमें रूठे रिश्तों की कोई फरियाद है।  आज मन में एक अजीब सी कसक है, शायद यह अधूरे ख्वाबों की सिसक है।  रूठ जाता है यह अपनों को मनाने में, टूट जाता है यह फासले बढ़ाने में। यह कोमल सा मन हो जाता है कठोर, जब नहीं मिलता इसे अपने प्रश्नों का कोई ओर-छोर।  न जाने क्यों रहता है ये आजकल खफा, हर दफा, कुछ भी नहीं है कहता, बस हर वक्त सहता ही रहता। खोया-खोया सा है, आज मन कुछ रोया-रोया सा है। 

चुप्पी

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चुप - चुप से रहते हो, बताओं ना क्यों कुछ नहीं कहते हो मेरी हर खुशी, हर गम को इत्मीनान से सुनते हो, फिर क्यों कभी अपनी नहीं कहते हो? माना हम हैं तुम्हारे और तुम भी हो हमारे, फिर भी न जाने क्यों आज लगता है कि जुदा हैं हमारे किनारे। तुमने ही तो सिखाया था मुझे अपने मन की कहना, फिर तुमने कब से शुरू कर दिया यूं चुपचाप रहना। तुम्हारी खामोशी से सहम गई हूं, मैं अब तुम्हारे कुछ कहने के  इंतजार में ठहर गई हूं। चुपचाप से आना और अपनी चुप्पी तोड़ लाना, आते हुए मेरे सवालों के जवाब ढूढ़ लाना। कह देना दिल की बातें और हो जाना बेबाक , क्योंकि तुम्हें सुने बिना धड़कनें रहने लगी हैं उदास । मेरे मन के जख्मों का मरहम बन जाना, इस बार आना तो वापस फिर न जाना।