चुप्पी

चुप-चुप से रहते हो, बताओं ना क्यों कुछ नहीं कहते हो
मेरी हर खुशी, हर गम को इत्मीनान से सुनते हो, फिर क्यों कभी अपनी नहीं कहते हो?
माना हम हैं तुम्हारे और तुम भी हो हमारे, फिर भी न जाने क्यों आज लगता है कि जुदा हैं हमारे किनारे।
तुमने ही तो सिखाया था मुझे अपने मन की कहना, फिर तुमने कब से शुरू कर दिया यूं चुपचाप रहना।
तुम्हारी खामोशी से सहम गई हूं, मैं अब तुम्हारे कुछ कहने के इंतजार में ठहर गई हूं।
चुपचाप से आना और अपनी चुप्पी तोड़ लाना, आते हुए मेरे सवालों के जवाब ढूढ़ लाना।
कह देना दिल की बातें और हो जाना बेबाक, क्योंकि तुम्हें सुने बिना धड़कनें रहने लगी हैं उदास
मेरे मन के जख्मों का मरहम बन जाना, इस बार आना तो वापस फिर न जाना।

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