हां! पुरुष भी होते हैं प्रताणना का शिकार

वॉट वुमन वांट? इस प्रश्न का उत्तर शायद ही दुनिया के किसी पुरुष के पास हो। अगर ढूंढ़ा जाए तो शायद कुछ ऐसी महिलाएं भी मिल जाए जो यह न बता पाए कि असल में महिलाओं और लड़कियों को क्या चाहिए। खैर... यह चर्चा इसलिए, क्योंकि कुछ रोज पहले एक ऐसा मामला मुझे खबरों में पढ़ने को मिला, जिसने मुझे भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि असल में महिलाओं को क्या चाहिए? दरसल, #boyslockerroom मामले में हालही में एक बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया कि जिस वॉयरल चैट को लेकर हम सब लड़कों की मानसिकता पर सवाल उठा रहे थे, वह चैट असल में एक नाबालिग लड़की द्वारा लड़के की फेक आईडी बना कर की गई थी। पुलिस द्वारा पूछताछ किए जाने पर लड़की ने बताया कि, उसने ऐसा अपने बॉयफ्रेंड का लड़कियों के प्रति नजरिया जानने के लिए किया। बताईये भला, जिसपर विश्वास कर बॉयफ्रेंड बनाया उसके नजरिये पर ही शक हो गया। वैसे किसी का लड़कियों के प्रति नजरिया जानने का यह तरीका वाकई हैरान करता है।
ऐतराज फिल्म का एक डॉयलाग है कि, "जब कोई मर्द किसी लड़की को थप्पड़ मारता है, तो हम कहते हैं कि बड़ा ही जालिम मर्द है। और जब कोई औरत किसी मर्द को थप्पड़ मारती है तब भी हम कहते हैं कि जरूर मर्द ने ही कोई बदसलूकी की होगी। दोनों ही मामलों में हम मर्द को ही कसूरवार ठहराते हैं।"
#boyslockerroom के मामले में जो खुलासा हुआ है, उसपर यह डॉयलाग सटीक बैठता है। कहने का अर्थ है कि मामले के शुरुआत में आरोपी ग्रुप से जुड़े लड़कों को ही ठहराया गया था। पुलिस ने शुरुआती कार्रवाई में सबसे पहले ग्रुप के एडमिन को ही पूछताछ के लिए पकड़ा था। इससे पता चलता है कि अगर लड़के- लड़की से जुड़ा कोई भी मामला हो तो समाज व प्रशासन पहला दोषी लड़कों को ही मानता है।
मेरा मानना है कि इस तरह के मामलों में शुरुआत से ही पुलिस द्वारा दोनों पक्षों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए। क्योंकि यह पहला मामला नहीं है जिसमें दोषी लड़की है, पर पूछताछ व लोगों के गुस्से का सामना लड़के को ही करना पड़ा। गूगल पर सर्च करेंगे तो हमें पिछले कई सालों के ऐसे तमाम मामले देखने को मिल जाएंगे, जिसमें कई लड़कों को उन गलतियों की सजा भोगनी पड़ी जो उन्होंने की ही नहीं।
(यहां मेरा मकसद किसी एक लिंग पर विशेष रूप से टिप्पणी करना नहीं है, बस मेरा उद्देश्य यहां ये याद दिलाना है कि आज के समय में जब हम समानता की बात करते हैं तो सजा के मामले में भेदभाव क्यों?) 
यह मामला भले ही किसी को जानबूझकर फसाने का न हो, पर ये मामला हमें हमारी मानसिकता जरूर दिखाता है। इस मामले से हमें यह तो पता चल गया कि इस तरह के मामलों में हम पहला दोषी लड़कों को ही मानते हैं। साथ ही साथ इससे यह भी पता चलता है कि कहीं न कहीं हमने अपने बच्चों में भी इस तरह की सोच पैदा कर दी है। क्योंकि मामले की दोषी लड़की ने जिस कारण से घटना को अंजाम दिया उससे सिद्ध होता है कि उस नाबालिग लड़की के मन भी कहीं न कहीं यह बात थी कि लड़के लड़कियों के बारे में गलत ही सोचते हैं।

सोच बदलने की है जरूरत :
इस घटना ने हमें यह सोचने पर विवश कर दिया है कि हमें अपने समाज की सोच बदलने की जरूरत है। माना कि हम आए दिन खबरों में लड़कियों के साथ होने वाली अभद्रता को देखते वा पढ़ते हैं, जिनमें अधिकतर मामलों में दोषी पुरुष ही होते हैं। पर इससे यह कतई सिद्ध नहीं होता कि लड़की से जुड़ी हर घटना में कोई पुरुष ही आरोपी है। हमें समाज की सोच बदलने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे।

पुरुषों के लिए क्यों सख्त है समाज? :
हमारे आसपास ऐसे कई मामले होते हैं, जिनमें एक पुरुष किसी महिला द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। वह चाहे मानसिक रूप से हो या शारीरिक रूप से, पर इस तरह के गिने चुने मामले ही लोगों के सामने आ पाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि समाज में मर्दों की छवि सख्त और मुश्किलों का स्वयं ही सामना करने वाले जैसी दिखाई गई है। समाज की इस रुढ़िवादी सोच के चलते अधिकतर मामलें सामने ही नहीं आते। मुझे ऐसा लगता है कि हमारे देश में महिलाओं के शोषण की समस्या को जितने दुख के साथ देखा जाता है, पुरुषों को वो एहमियत नहीं मिलती या यूं कहें कि कम मिलती है।
यहां अगर कोई महिला मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित होती है तो उसे इंसाफ दिलाने के लिए न्यूज चैनलों पर तुरंत वादविवाद छिड़ जाता है। पर यही अगर किसी मर्द के साथ हो तो किसी को उसके इंसाफ से फर्क नहीं पड़ता।
सोचिए जरा क्या बीती होगी उस नाबालिग लड़के पर जब पुलिस उसे पकड़ कर ले गई होगी, वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वह ग्रुप का एडमिन था। वहीं इस दौरान #girlslockerroom जैसे एक ग्रुप की चैट भी सामने आईं, जिसमें लड़कियों द्वारा लड़कों के विषय में अभद्र बातें की जा रही है पर अधिकतर न्यूज चैनलों व अखबारों ने उस चैट पर कोई चर्चा नहीं की। ऐसा शायद इसलिए क्योंकि यह समाज में लड़कियों की छवि खराब कर देता।

सभ्यता से बढ़ रही दूरी :
नाबालिग बच्चों द्वारा एक दूसरे के लिए की गई अभद्र बातें वाकई चर्चा का विषय है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। इस घटना में भले ही बच्चों को दोषी ठहराया जा रहा हो, पर असल में दोषी हम और हमारा समाज है। इस घटना की जिम्मेदार वो फिल्में व नाटक हैं, जिनमें खुलेआम लड़कियों को एक वस्तु की तरह पेश किया जाता है। साथ ही वे लोग जो किसी भी स्थान पर (भले मजाक में ही क्यों न) अभद्र भाषा का प्रयोग करने से नहीं चूकते। कहने को तो हम हर दिन मॉडर्न होते जा रहे हैं, पर मॉडर्न होने के साथ-साथ हम अपनी तमीज व तहजीब भी भूलते जा रहे हैं। आज के समय में चाहे लड़की हो या लड़का, स्त्री हो या पुरुष सभी आम बातचीत में कुछ ऐसे शब्द प्रयोग करने लगे हैं, जिन्हें आम भाषा में अभद्र कहा जा सकता है। यह चलन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि आज के समय में इसे लोग 'कूल' होना मानते है। जरा सोचिए जब हम बड़े हो कर 'कूल' दिखना चाह रहे हैं तो बच्चों को तो वैसे भी नई चीजें भाती हैं।

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