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अनपढ़ है मेरी माँ

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अनपढ़ है मेरी माँ, पर समय को पढ़ना जानती है, खराब समय को भी वह अच्छे से गढ़ना जानती है।  मन की टुक-टुक और मस्तिष्क की टिक-टिक को भी पढ़ लेती है। माँ अनपढ़ है मेरी, न जाने ये सब कैसे कर लेती है। वो गणित में मेरा जोड़-घटाना और अंग्रेजी में शब्दों का भूल जाना माँ बखूबी समझती है। खुद अनपढ़ हो कर भी मुझे हर वक्त पढ़ने को कहती है। मेरी परिक्षा की तिथि हो या मेरे किसी ज़रूरी काम की, मुझसे पहले माँ को याद आती है। मेरी माँ अनपढ़ है, फिर भी वह हर तिथि दिमाग में लिख लेती है।  मेरी चिकित्सक, मेरी सलाहकार है, माँ अनपढ़ ज़रूर है मेरी पर उसे पढ़े-लिखों से भी अधिक ज्ञान है।

बावरा मन

आज मन बड़ा उदास है, न जाने इसे किस बात की आस है।  न रोता है न ही चैन से सोता है, खुदा जाने ये क्या-क्या खुद में ही संजोता है।  शायद आज मन में उभरा कोई अनकहा इतिहास है या इसमें रूठे रिश्तों की कोई फरियाद है।  आज मन में एक अजीब सी कसक है, शायद यह अधूरे ख्वाबों की सिसक है।  रूठ जाता है यह अपनों को मनाने में, टूट जाता है यह फासले बढ़ाने में। यह कोमल सा मन हो जाता है कठोर, जब नहीं मिलता इसे अपने प्रश्नों का कोई ओर-छोर।  न जाने क्यों रहता है ये आजकल खफा, हर दफा, कुछ भी नहीं है कहता, बस हर वक्त सहता ही रहता। खोया-खोया सा है, आज मन कुछ रोया-रोया सा है। 

चुप्पी

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चुप - चुप से रहते हो, बताओं ना क्यों कुछ नहीं कहते हो मेरी हर खुशी, हर गम को इत्मीनान से सुनते हो, फिर क्यों कभी अपनी नहीं कहते हो? माना हम हैं तुम्हारे और तुम भी हो हमारे, फिर भी न जाने क्यों आज लगता है कि जुदा हैं हमारे किनारे। तुमने ही तो सिखाया था मुझे अपने मन की कहना, फिर तुमने कब से शुरू कर दिया यूं चुपचाप रहना। तुम्हारी खामोशी से सहम गई हूं, मैं अब तुम्हारे कुछ कहने के  इंतजार में ठहर गई हूं। चुपचाप से आना और अपनी चुप्पी तोड़ लाना, आते हुए मेरे सवालों के जवाब ढूढ़ लाना। कह देना दिल की बातें और हो जाना बेबाक , क्योंकि तुम्हें सुने बिना धड़कनें रहने लगी हैं उदास । मेरे मन के जख्मों का मरहम बन जाना, इस बार आना तो वापस फिर न जाना।

तन्हाई

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तन्हाइयों को नहीं  पसंद   तन्हाई ,  आज  उन्होंने मुझे ये  अजीब  सी  बात   बताई । कभी तकिये को भीगोना, कभी बीते लम्हों को पिरोना, तन्हाइयों को नहीं भाता लोगों का  इस   तरह  दुखों को संजोना।

अब खुल कर मुस्करा रही है पृथ्वी

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लॉकडाउन के बाद देश के हर क्षेत्र में प्रदूषण पूरी तरह समाप्त हो गया। अब यहां की नदियों में स्वच्छ - निर्मल पानी है, हवा में मिट्टी का सौंधा पन है और आकाश हंस के समान सफेद है। अब सड़कों पर भी सिर्फ उड़ते हुए पत्ते ही दिखते हैं, उनके साथ उड़ती पन्नियां नहीं। अब घर के बगीचे में चिड़ियों की चहचहाहट अधिक सुनाई देती है, साथ ही अब सुबह के सूरज का तेज भी शीतल लगता है। ठीक से सोचने पर भी आसपास का ऐसा कोई साल याद नहीं आया जब अखबार में देश में बढ़ते प्रदूषण की कोई खबर न आई हो। पर आज हालात इतने सुधर गए कि पत्रकारों की कलम चाह कर भी देश के वातावरण की आलोचना नहीं कर पा रही है। बचपन में सुना था कि पृथ्वी हम मनुष्यों का घर है, पर अब यह सत्य एक अनकहे झूठ सा लगता है। क्योंकि कुछ समय पहले तक पृथ्वी का हाल देख कर यह घर जैसी तो बिल्कुल नहीं लगती थी। ऐसा इसलिए , क्योंकि मनुष्य के ईंट और चूने से बने मकानों में तो कचरे का ढेर नहीं दिखता है और ना ही इन मकानों में सीवेज की दुर्गंध आती है। हम सब हमेशा से अपने मकानों की स्वच्छत...

हां! पुरुष भी होते हैं प्रताणना का शिकार

वॉट वुमन वांट?  इस प्रश्न का उत्तर शायद ही दुनिया के किसी पुरुष के पास हो। अगर ढूंढ़ा जाए तो शायद कुछ ऐसी महिलाएं भी मिल जाए जो यह न बता पाए कि असल में महिलाओं और लड़कियों को क्या चाहिए। खैर... यह चर्चा इसलिए, क्योंकि कुछ रोज पहले एक ऐसा मामला मुझे खबरों में पढ़ने को मिला, जिसने मुझे भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि असल में महिलाओं को क्या चाहिए? दरसल, # boyslockerroom मामले में हालही में एक बड़ा खुलासा हुआ है। जांच में सामने आया कि जिस वॉयरल चैट को लेकर हम सब लड़कों की मानसिकता पर सवाल उठा रहे थे, वह चैट असल में एक नाबालिग लड़की द्वारा लड़के की फेक आईडी बना कर की गई थी। पुलिस द्वारा पूछताछ किए जाने पर लड़की ने बताया कि, उसने ऐसा अपने बॉयफ्रेंड का लड़कियों के प्रति नजरिया जानने के लिए किया। बताईये भला, जिसपर विश्वास कर बॉयफ्रेंड बनाया उसके नजरिये पर ही शक हो गया। वैसे किसी का लड़कियों के प्रति नजरिया जानने का यह तरीका वाकई हैरान करता है। ऐतराज फिल्म का एक डॉयलाग है कि, "जब कोई मर्द किसी लड़की को थप्पड़ मारता है, तो हम कहते हैं कि बड़ा ही जालिम मर्द है। और जब कोई औरत किसी मर्द को...

'वॉयरल सोच', शुरुआत अब नहीं तो कब?

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# Boislockerroom  ये हैशटैग आजकल सोशल मीडिया पर काफी  ट्रेंड कर रहा है। खबरों की माने तो यह इंस्टाग्राम पर बनाए गए एक ग्रुप का नाम है। इसके ट्रेंड होने की मुख्य वजह ग्रुप से जुड़े लड़कों के बीच होने वाली बातचीत है, जिसमें वह धड़ल्ले से लड़कियों व उनके अंगों पर अभद्र टिप्पणियां करते देखे जा रहे हैं। ग्रुप में होने वाली अश्लील बातों से आहत एक लड़की ने लड़कों की इस चैट को ट्वीटर पर शेयर कर दिया, जिसके बाद मामला पुलिस व मीडिया के सामने आ सका। वहीं लड़की के इस तरह चैट सार्वजनिक करने से बौखलाए लड़के इस कदर आहत हुए कि उन्होंने कुछ लड़कियों की नग्न तस्वीरें सार्वजनिक करने का फैसला कर लिया। हालांकि ऐसा होने से पहले ही लड़कों की यह चैट भी वॉयरल हो गई । जानकारों के अनुसार यह ग्रुप दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ने वाले लड़कों का है।     इस दौरान दिल्ली के ही कुछ अन्य लड़कों के स्नैपटैच ग्रुप की चैट भी सामने आई , जिसमें लड़कों द्वारा किसी लड़की का गैंगरेप करने पर चर्चा की जा रही है। इस ग्रुप की चैट द...

अवध की छत

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अवध की शाम में फिर वही बात हो गई, बड़ी मुद्दतों बाद उनसे छत पर मुलाकात हो गई। 💖 अवध की ये 'शाम' फिर से गुलज़ार हो गई, क्योंकि यहां तन्हाईयाँ तमाम हो गईं।💔 फिर से बीतने लगीं छतों पर लोगों की शामें, टहलने के बहाने ही सही, याद आए गुजरे जमाने।💝 बरसों पहले जिसे भूल गया था जमाना, वही बन गया आज सबका फ़साना।💓 अवध की छतें फिर पतंगों से सराबोर हो गईं, क्योंकि लोगों में फिर से पेचें लड़ाने की होड़ हो गई।💞

दिल से, दिल को

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हमारी शुरुआत ही खटास के साथ हुई, इसलिए मैंने तुमसे मिठास की उम्मीद ही न की। फिर भी जाने अनजाने तुमने मुझे कई बार हंसाया और इसी तरह तुमने मेरा हर दिन बनाया। कई अहम सबक भी सिखाए हैं तुमने, पहले से अधिक द्रढ़ बनाया और इसी तरह तुम रहे हमेशा बनकर मेरा साया। पहली मुलाकात में ही चिढ़ गई थी तुमसे, फिर भी तुमने मेरे साथ ही हर कदम बढ़ाया। मेरे सही, गलत और सही करने के बाद गलत फैसले लेने को भी तुमने सराहा और इस तरह तुमने मेरे मुताबिक ही माहौल बना डाला। एक दिन सोचा कि क्या सही थी हमारी शुरुआत, क्यों नहीं की मैने तुमसे कभी कोई बात? वैसे अब तो कभी न मिलेगा मुझे तुम्हारा साथ और न ही आओगे तुम फिर कभी थामने मेरा हाथ, रोक भी नहीं सकतें तुम्हें, न ही पलट सकतें हैं हम घड़ी का कांटा, इसलिए दिल से कह रहे हैं तुम्हें टाटा।  अलविदा 2019...!

आकांक्षा

शुरू से शुरू करूं तो शायद शुरू ही न कर पाऊं, ये मेरे दिल का हाल है... मैं खुद इसे दुनिया से रुबरू ही न करा पाऊं। देखे थे जो ख्वाब अनेक अब तो वो यादों में बस गए, जिन गुलाब का गुलदस्ता बनाने की सोची थी, वो तो पहली पतझड़ में ही झड़ गए। प्लान 'ए' के बनते ही प्लान 'बी' और 'सी' भी बना लिया करती थी... प्लान 'ए' के टूटते ही 'बी' और 'सी' तो किसी अंजान बस्ते में गुम गए। हुई थी निराश अपने आप से, फटकारा भी था खुद को जरा सा, अपनों और सपनों के बीच, हो गई थी अकेली मानों हो एक पहेली। मन था उदास, मस्तिष्क था निराश... लगने लगा था ये जहां खाली-खाली, क्योंकि पाल ली थी मैंने मन में हारी एक नारी। हां भूल गई थी मैं कि ये नारी ही है जो कभी नहीं है हारी। आज फिर से जनूगी एक आकांक्षा के साथ नई आकांक्षा, प्लान 'ए' के साथ प्लान 'बी' और 'सी' फिर से बनाऊंगी... इसके बाद ही अपने दिल का हाल दुनिया को सुनाऊंगी।