बावरा मन

आज मन बड़ा उदास है, न जाने इसे किस बात की आस है। 
न रोता है न ही चैन से सोता है, खुदा जाने ये क्या-क्या खुद में ही संजोता है। 
शायद आज मन में उभरा कोई अनकहा इतिहास है या इसमें रूठे रिश्तों की कोई फरियाद है। 
आज मन में एक अजीब सी कसक है, शायद यह अधूरे ख्वाबों की सिसक है। 
रूठ जाता है यह अपनों को मनाने में, टूट जाता है यह फासले बढ़ाने में।
यह कोमल सा मन हो जाता है कठोर, जब नहीं मिलता इसे अपने प्रश्नों का कोई ओर-छोर। 
न जाने क्यों रहता है ये आजकल खफा, हर दफा, कुछ भी नहीं है कहता, बस हर वक्त सहता ही रहता।
खोया-खोया सा है, आज मन कुछ रोया-रोया सा है। 

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