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Showing posts from June, 2020

चुप्पी

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चुप - चुप से रहते हो, बताओं ना क्यों कुछ नहीं कहते हो मेरी हर खुशी, हर गम को इत्मीनान से सुनते हो, फिर क्यों कभी अपनी नहीं कहते हो? माना हम हैं तुम्हारे और तुम भी हो हमारे, फिर भी न जाने क्यों आज लगता है कि जुदा हैं हमारे किनारे। तुमने ही तो सिखाया था मुझे अपने मन की कहना, फिर तुमने कब से शुरू कर दिया यूं चुपचाप रहना। तुम्हारी खामोशी से सहम गई हूं, मैं अब तुम्हारे कुछ कहने के  इंतजार में ठहर गई हूं। चुपचाप से आना और अपनी चुप्पी तोड़ लाना, आते हुए मेरे सवालों के जवाब ढूढ़ लाना। कह देना दिल की बातें और हो जाना बेबाक , क्योंकि तुम्हें सुने बिना धड़कनें रहने लगी हैं उदास । मेरे मन के जख्मों का मरहम बन जाना, इस बार आना तो वापस फिर न जाना।

तन्हाई

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तन्हाइयों को नहीं  पसंद   तन्हाई ,  आज  उन्होंने मुझे ये  अजीब  सी  बात   बताई । कभी तकिये को भीगोना, कभी बीते लम्हों को पिरोना, तन्हाइयों को नहीं भाता लोगों का  इस   तरह  दुखों को संजोना।

अब खुल कर मुस्करा रही है पृथ्वी

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लॉकडाउन के बाद देश के हर क्षेत्र में प्रदूषण पूरी तरह समाप्त हो गया। अब यहां की नदियों में स्वच्छ - निर्मल पानी है, हवा में मिट्टी का सौंधा पन है और आकाश हंस के समान सफेद है। अब सड़कों पर भी सिर्फ उड़ते हुए पत्ते ही दिखते हैं, उनके साथ उड़ती पन्नियां नहीं। अब घर के बगीचे में चिड़ियों की चहचहाहट अधिक सुनाई देती है, साथ ही अब सुबह के सूरज का तेज भी शीतल लगता है। ठीक से सोचने पर भी आसपास का ऐसा कोई साल याद नहीं आया जब अखबार में देश में बढ़ते प्रदूषण की कोई खबर न आई हो। पर आज हालात इतने सुधर गए कि पत्रकारों की कलम चाह कर भी देश के वातावरण की आलोचना नहीं कर पा रही है। बचपन में सुना था कि पृथ्वी हम मनुष्यों का घर है, पर अब यह सत्य एक अनकहे झूठ सा लगता है। क्योंकि कुछ समय पहले तक पृथ्वी का हाल देख कर यह घर जैसी तो बिल्कुल नहीं लगती थी। ऐसा इसलिए , क्योंकि मनुष्य के ईंट और चूने से बने मकानों में तो कचरे का ढेर नहीं दिखता है और ना ही इन मकानों में सीवेज की दुर्गंध आती है। हम सब हमेशा से अपने मकानों की स्वच्छत...