अवध की छत
अवध की ये 'शाम' फिर से गुलज़ार हो गई, क्योंकि यहां तन्हाईयाँ तमाम हो गईं।💔
फिर से बीतने लगीं छतों पर लोगों की शामें, टहलने के बहाने ही सही, याद आए गुजरे जमाने।💝
बरसों पहले जिसे भूल गया था जमाना, वही बन गया आज सबका फ़साना।💓
अवध की छतें फिर पतंगों से सराबोर हो गईं, क्योंकि लोगों में फिर से पेचें लड़ाने की होड़ हो गई।💞

👍
ReplyDeleteWooow
ReplyDeleteबहुत सुंदर लिखा है मैम👌
ReplyDeleteअति सुन्दर 🥰🥰
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