आकांक्षा

शुरू से शुरू करूं तो शायद शुरू ही न कर पाऊं, ये मेरे दिल का हाल है... मैं खुद इसे दुनिया से रुबरू ही न करा पाऊं।
देखे थे जो ख्वाब अनेक अब तो वो यादों में बस गए, जिन गुलाब का गुलदस्ता बनाने की सोची थी, वो तो पहली पतझड़ में ही झड़ गए।
प्लान 'ए' के बनते ही प्लान 'बी' और 'सी' भी बना लिया करती थी... प्लान 'ए' के टूटते ही 'बी' और 'सी' तो किसी अंजान बस्ते में गुम गए।
हुई थी निराश अपने आप से, फटकारा भी था खुद को जरा सा, अपनों और सपनों के बीच, हो गई थी अकेली मानों हो एक पहेली।
मन था उदास, मस्तिष्क था निराश... लगने लगा था ये जहां खाली-खाली, क्योंकि पाल ली थी मैंने मन में हारी एक नारी।
हां भूल गई थी मैं कि ये नारी ही है जो कभी नहीं है हारी।
आज फिर से जनूगी एक आकांक्षा के साथ नई आकांक्षा, प्लान 'ए' के साथ प्लान 'बी' और 'सी' फिर से बनाऊंगी... इसके बाद ही अपने दिल का हाल दुनिया को सुनाऊंगी। 

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